हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 20.116.2

कांड 20 → सूक्त 116 → मंत्र 2 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 116
अम॑न्म॒हीद॑ना॒शवो॑ऽनु॒ग्रास॑श्च वृत्रहन् । सु॒कृत्सु ते॑ मह॒ता शू॑र॒ राध॒सानु॒ स्तोमं॑ मुदीमहि ॥ (२)
हे वृत्रहंता इंद्र! हम तुम्हारी वृद्धि के द्वारा सुखी हों तथा अपने को नाश से रहित मानें. (२)
O Vritrahanta Indra! May we be happy through your growth and consider ourselves free from destruction. (2)