हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 20.123.2

कांड 20 → सूक्त 123 → मंत्र 2 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 123
तन्मि॒त्रस्य॒ वरु॑णस्याभि॒चक्षे॒ सूर्यो॑ रू॒पं कृ॑णुते॒ द्योरु॒पस्थे॑ । अ॑न॒न्तम॒न्यद्रुश॑दस्य॒ प्राजः॑ कृ॒ष्णम॒न्यद्ध॒रितः॒ सं भ॑रन्ति ॥ (२)
मैं मित्र और वरुण की महिमा का गान करता हूं. वे सूर्य के रूप में स्वर्ग में अपने रूप का निर्माण करते हैं, जिस से उन का तेज प्रकाशित होता है. इन का दूसरा तेज काले रंग का है. उसे सूर्य की रश्मियां धारण करती हैं. (२)
I sing the glory of friend and Varun. They create their form in heaven in the form of the sun, from which their glory is illuminated. The second sharp of these is black. He is wearing the rays of the sun. (2)