हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 20.125.2

कांड 20 → सूक्त 125 → मंत्र 2 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 125
कु॒विद॒ङ्ग यव॑मन्तो॒ यवं॑ चि॒द्यथा॒ दान्त्य॑नुपू॒र्वं वि॒यूय॑ । इ॒हेहै॑षां कृणुहि॒ भोज॑नानि॒ ये ब॒र्हिषो॒ नमो॑वृक्तिं॒ न ज॒ग्मुः ॥ (२)
हे अग्नि! जिस प्रकार संपन्न कृषक जौ के बहुत से पौधों को मिला कर काटते हैं, उसी प्रकार तुम हवि से युक्त कुशों का सेवन करो. (२)
O agni! Just as rich farmers cut many plants of barley together, in the same way you should eat kushas with havi. (2)