अथर्ववेद (कांड 20)
प्रि॒या त॒ष्टानि॑ मे क॒पिर्व्य॑क्ता॒ व्यदूदुषत् । शिरो॒ न्वस्य राविषं॒ न सु॒गं दु॒ष्कृते॑ भुवं॒ विश्व॑स्मा॒दिन्द्र॒ उत्त॑रः ॥ (५)
वृषाकपि ने मेरे स्नेही जनों को दुर्बल बनाया है तथा व्यक्ता ने उन्हें दोषी किया है. बुरे कार्य में प्रकट होना सुगम नहीं होता. इसलिए मैं इस के शीश को शब्द वाला बनाता हूं. इस प्रकार इंद्र सब से उत्कृष्ट हैं. (५)
Vrushakpi has made my loved ones weak and the person has blamed them. It is not easy to appear in bad work. That's why I make this glass word. Thus Indra is the best of all. (5)