अथर्ववेद (कांड 20)
यः स॒भेयो॑ विद॒थ्य: सु॒त्वा य॒ज्वाथ॒ पूरु॑षः । सूर्यं॒ चामू॑ रि॒शादस॒स्तद्दे॒वाः प्राग॑कल्पयन् ॥ (१)
अभिषव अर्थात् सोमरस निचोड़ने का काम करने वाला, यज्ञकर्ता एवं सभ्य पुरुष सूर्यलोक को भेद कर उस से ऊपर वाले लोक में जाता है. इस की कल्पना देवताओं ने पहले कर ली थी. (१)
Abhishav i.e. someras, the one who works to squeeze, the yajnakar and the civilized man distinguish the sun and go to the world above it. This was imagined by the gods earlier. (1)
अथर्ववेद (कांड 20)
यो जा॒म्या अप्र॑थय॒स्तद्यत्सखा॑यं॒ दुधू॑र्षति । ज्येष्ठो॒ यद॑प्रचेता॒स्तदा॑हु॒रध॑रा॒गिति॑ ॥ (२)
जाम्य ने जिसे विस्तृत किया, वह मित्र को सुशोभित करता है. जो ज्येष्ठ प्रचेता है, उसे लोग अधराक् कहते हैं. (२)
What Jamya elaborates adorns the friend. The one who is the eldest pracheta is called a half-hearted. (2)
अथर्ववेद (कांड 20)
यद्भ॒द्रस्य॒ पुरु॑षस्य पु॒त्रो भ॑वति दाधृ॒षिः । तद्वि॒प्रो अब्र॑वीदु॒ तद्ग॑न्ध॒र्वः काम्यं॒ वचः॑ ॥ (३)
जिस ब्राह्मण का पुत्र धारण करने वाला होता है. वह ब्राह्मण अभीष्ट वचन करने में समर्थ है. ऐसा गंधर्व कहते हैं. (३)
The Brahmin whose son is going to be assumed. That Brahmin is capable of making desired promises. This is what Gandharva says. (3)
अथर्ववेद (कांड 20)
यश्च॑ प॒णि रघु॑जि॒ष्ठ्यो यश्च॑ दे॒वाँ अदा॑शुरिः । धीरा॑णां॒ शश्व॑ताम॒हं तद॑पा॒गिति॑ शुश्रुम ॥ (४)
जो वणिक् देवताओं को हवि दान नहीं करता, वह शाश्वत वीरों का सेवक बनता है. ऐसा सुना जाता है. (४)
He who does not donate havi to the merchant gods becomes a servant of eternal heroes. It is heard. (4)
अथर्ववेद (कांड 20)
ये च॑ दे॒वा अय॑ज॒न्ताथो॒ ये च॑ पराद॒दिः । सूर्यो॒ दिव॑मिव ग॒त्वाय॑ म॒घवा॑ नो॒ वि र॑प्शते ॥ (५)
जो स्तोता एवं परा गौ का दान करने वाले हैं, वे सूर्य के समान स्वर्ग में जाते हैं. (५)
Those who donate stota and para cow, they go to heaven like the sun. (5)
अथर्ववेद (कांड 20)
योऽना॒क्ताक्षो॑ अनभ्य॒क्तो अम॑णि॒वो अहि॑र॒ण्यवः॑ । अब्र॑ह्मा॒ ब्रह्म॑णः पु॒त्रस्तो॒ता कल्पे॑षु सं॒मिता॑ ॥ (६)
जो भक्त नहीं है, जो आक्त अदक्ष नहीं है, जो मणिवान नहीं, जो हिरपाप नहीं है तथा जो ब्राह्मण नहीं है; वह ब्रह्म पुत्र स्तोता कल्पों में मान्य है. (६)
He who is not a devotee, who is not a devotee, who is not a manivan, who is not a hirpapa and who is not a Brahmin; That Brahma putra stota is valid in kalpas. (6)
अथर्ववेद (कांड 20)
य आ॒क्ताक्षः॑ सुभ्य॒क्तः सुम॑णिः॒ सुहि॑र॒ण्यवः॑ । सुब्र॑ह्मा॒ ब्रह्म॑णः पु॒त्रस्तो॒ता कल्पे॑षु सं॒मिता॑ ॥ (७)
जो आक्त अक्ष हैं, जो सुभक्त हैं, जो सुंदर मणि वाले हैं; ऐसे ब्रह्म पुत्र स्तोता हैं, यह कल्पों अर्थात् कला ग्रंथों में माना गया है. (७)
those who are aakta aksha, who are good-loving, those who are beautiful gems; Such Brahma putras are stotas, it has been considered in kalpas i.e. art texts. (7)
अथर्ववेद (कांड 20)
अप्र॑पा॒णा च॑ वेश॒न्ता रे॒वाँ अप्रति॑दिश्ययः । अय॑भ्या क॒न्या कल्या॒णी तो॒ता कल्पे॑षु सं॒मिता॑ ॥ (८)
जो सरोवर जलपूर्ण नहीं हैं; जो धनी हैं, पर दानी नहीं है; जो कन्याएं गृहस्थ धर्म के योग्य नहीं हैं, ऐसा कल्प ग्रंथों के अनुसार है. (८)
Lakes that are not waterproof; Those who are rich, but not generous; Girls who are not eligible for household dharma, it is according to kalpa texts. (8)