अथर्ववेद (कांड 20)
वित॑तौ किरणौ॒ द्वौ तावा॑ पिनष्टि॒ पूरु॑षः । न वै॑ कुमारि॒ तत्तथा॒ यथा॑ कुमारि॒ मन्य॑से ॥ (१)
हे कुमारी! तू उसे जैसा समझती है, वह वैसा नहीं है. दो किरणें फैली हुई हैं. पुरुष उन्हें पीसने वाला है. (१)
O virgin! He is not what you think of him. Two rays are spread. The man is going to grind them. (1)