अथर्ववेद (कांड 20)
मा॒तुष्टे कि॑रणौ॒ द्वौ निवृ॑त्तः॒ पुरु॑षानृते । न वै॑ कुमारि॒ तत्तथा॒ यथा॑ कुमारि॒ मन्य॑से ॥ (२)
हे पुरुष! तू जिस असत्य से मुक्त हुआ है, वह तेरी माता की दो किरणें हैं. हे कुमारी! उसे तू जैसा समझती है, वह उस तरह का नहीं है. (२)
O man! The untruth from which you have been freed is the two rays of your mother. O virgin! He is not the kind you think of him as you think. (2)