हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 20.133.3

कांड 20 → सूक्त 133 → मंत्र 3 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 133
निगृ॑ह्य॒ कर्ण॑कौ॒ द्वौ निरा॑यच्छसि॒ मध्य॑मे । न वै॑ कुमारि॒ तत्तथा॒ यथा॑ कुमारि॒ मन्य॑से ॥ (३)
हे मध्यमा! तू दोनों कानों को पकड़ कर उसे नियुक्त करती है. तू उसे जैसा समझती है, वह उस प्रकार का नहीं है. (३)
O middle man! You hold both ears and appoint him. He is not the kind you think of him. (3)