अथर्ववेद (कांड 20)
यद॒द्य वां॑ नासत्यो॒क्थैरा॑चुच्युवी॒महि॑ । यद्वा॒ वाणी॑भिरश्विने॒वेत्का॒ण्वस्य॑ बोधतम् ॥ (४)
हे अश्विनीकुमारो! हम उकथों अर्थात् मंत्र समूहों के द्वारा तुम्हारा आश्रय लेते हैं. यह कण्व ऋषि की कृपा है कि हम वाणी के द्वारा तुम्हारी सेवा कर रहे हैं. (४)
O Ashwinikumaro! We take refuge in you through ukthas i.e. mantra groups. It is the grace of Kanva Rishi that we are serving you through speech. (4)