हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 140
यन्ना॑सत्या भुर॒ण्यथो॒ यद्वा॑ देव भिष॒ज्यथः॑ । अ॒यं वां॑ व॒त्सो म॒तिभि॒र्न वि॑न्धते ह॒विष्म॑न्तं॒ हि गच्छ॑थः ॥ (१)
हे अश्चिनीकुमारो! तुम शीघ्र गमन करने वाले तथा चिकित्सा करने में कुशल हो. तुम्हारा यह वत्स मोतियों के द्वारा नहीं बांधा जाता है. तुम उस के समीप जाते हो, जिस के पास हवि है. (१)
O Ashchini Kumaro! You are quick to move and are skilled in healing. This vatsa of yours is not tied by beads. You go close to him who has havi. (1)

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 140
आ नू॒नम॒श्विनो॒रृषि॒ स्तोमं॑ चिकेत वा॒मया॑ । आ सोमं॒ मधु॑मत्तमं घ॒र्मं सि॑ञ्चा॒दथ॑र्वणि ॥ (२)
उपासना के योग्य अपनी बुद्धियों के द्वारा ऋषियों ने अश्विनी कुमारों के स्तोत्र को जान लिया. इस लिए तुम मधुरता वाले सोमरस को अथर्व से सिंचित करो. (२)
Through their intellects worthy of worship, the sages knew the stotra of Ashwini Kumars. Therefore, you should irrigate the sweet Somaras with Atharva. (2)

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 140
आ नू॒नं र॒घुव॑र्तनिं॒ रथं॑ तिष्ठाथो अश्विना । आ वां॒ स्तोमा॑ इ॒मे मम॒ नभो॒ न चु॑च्यवीरत ॥ (३)
हे अश्चिनीकुमारो! तुम तेज चलने वाले रथ पर बैठने वाले हो. तुम्हारे लिए जो स्तुति की जाती है, वह आकाश के समान स्थिर रहे. (३)
O Ashchini Kumaro! You are going to sit on a fast-moving chariot. May the praise that is given to you stand as the sky. (3)

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 140
यद॒द्य वां॑ नासत्यो॒क्थैरा॑चुच्युवी॒महि॑ । यद्वा॒ वाणी॑भिरश्विने॒वेत्का॒ण्वस्य॑ बोधतम् ॥ (४)
हे अश्विनीकुमारो! हम उकथों अर्थात्‌ मंत्र समूहों के द्वारा तुम्हारा आश्रय लेते हैं. यह कण्व ऋषि की कृपा है कि हम वाणी के द्वारा तुम्हारी सेवा कर रहे हैं. (४)
O Ashwinikumaro! We take refuge in you through ukthas i.e. mantra groups. It is the grace of Kanva Rishi that we are serving you through speech. (4)

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 140
यद्वां॑ क॒क्षीवाँ॑ उ॒त यद्व्य॑श्व॒ ऋषि॒र्यद्वां॑ दी॒र्घत॑मा जु॒हाव॑ । पृथी॒ यद्वां॑ वै॒न्यः साद॑नेष्वे॒वेदतो॑ अश्विना चेतयेथाम् ॥ (५)
हे अश्चिनीकुमारो! कक्षीवान, दीर्घतमा और व्यश्च ऋषियों ने तुम्हें आहुति दी है. वेन का पुत्र पृथु तुम्हारे सब सदनों में है. इसलिए तुम चैतन्य हो जाओ. (५)
O Ashchini Kumaro! The arhtivaan, long-term and vyashtrishis have sacrificed you. Prithu son of Wayne is in all your houses. So you become conscious. (5)