हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 141
या॒तं छ॑र्दि॒ष्पा उ॒त नः॑ प॑र॒स्पा भू॒तं ज॑ग॒त्पा उ॒त न॑स्तनू॒पा । व॒र्तिस्तो॒काय॒ तन॑याय यातम् ॥ (१)
हे अश्चिनीकुमारो! तुम हमारे रक्षक के रूप में आओ. तुम हमारे घर की रक्षा करते हुए हमें मिलो. तुम हमारे पुत्र, पौत्र आदि के रूप में हमें प्राप्त होओ तथा संसार की रक्षा करने वाले हो कर हम से मिलो. (१)
O Ashchini Kumaro! You come as our protector. Meet us while you protect our house. May you receive us as our sons, grandsons, etc. and meet us as protectors of the world. (1)

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 141
यदिन्द्रे॑ण स॒रथं॑ या॒थो अ॑श्विना॒ यद्वा॑ वा॒युना॒ भव॑थः॒ समो॑कसा । यदा॑दि॒त्येभि॑रृ॒भुभिः॑ स॒जोष॑सा॒ यद्वा॒ विष्णो॑र्वि॒क्रम॑णेषु॒ तिष्ठ॑थः ॥ (२)
हे अश्विनीकुमारो! तुम इंद्र के रथ में उन के साथ बैठ कर चलते हो. तुम वायु के साथ चलने वाले, आदित्य और ऋभुओं, स्नेही तथा विष्णु के विक्रमणों अर्थात्‌ डगों से भी युक्त हो. (२)
O Ashwinikumaro! You sit with him in Indra's chariot and walk. You are also full of the vikramas of Aditya and The Rainbows, the loving and the wicked ones of Vishnu. (2)

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 141
यद॒द्याश्विना॑व॒हं हु॒वेय॒ वाज॑सातये । यत्पृ॒त्सु तु॒र्वणे॒ सह॒स्तच्छ्रेष्ठ॑म॒श्विनो॒रवः॑ ॥ (३)
हे अश्चिनीकुमारो! तुम यजमानों को शीघ्रता से प्राप्त होते ही युद्ध में अपनी उत्तम रक्षण शक्ति से शत्रु का वध करते हो. मैं तुम्हें अन्न प्राप्त करने के लिए बुलाता हूं. (३)
O Ashchini Kumaro! As soon as you get the hosts quickly, you kill the enemy with your good protective power in battle. I call you to get food. (3)

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 141
आ नू॒नं या॑तमश्विने॒मा ह॒व्यानि॑ वां हि॒ता । इ॒मे सोमा॑सो॒ अधि॑ तु॒र्वशे॒ यदा॑वि॒मे कण्वे॑षु वा॒मथ॑ ॥ (४)
हे अश्चिनीकुमारो! यह हव्य तुम्हारे लिए हितकारी है. यह सोमरस तुवर्श, यदु तथा कण्व ऋषि का है. तुम यहां अवश्य आगमन करो. (४)
O Ashchini Kumaro! This is beneficial for you. It belongs to Someras Tuvarsha, Yadu and Kanva Rishi. You must come here. (4)

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 141
यन्ना॑सत्या परा॒के अ॑र्वा॒के अस्ति॑ भेष॒जम् । तेन॑ नू॒नं वि॑म॒दाय॑ प्रचेतसा छ॒र्दिर्व॒त्साय॑ य॒च्छत॑म् ॥ (५)
हे अश्विनीकुमारो! दूर की अथवा समीप की ओषधि को अपने दंभी मन के द्वारा हमें विशेष शक्ति के लिए प्रदान करो तथा हमारे शिशु के लिए घर दो. (५)
O Ashwinikumaro! Give distant or near medicine to us with your conceited mind for special power and give a house for our baby. (5)