अथर्ववेद (कांड 20)
अभु॑त्स्यु॒ प्र दे॒व्या सा॒कं वा॒चाह॑म॒श्विनोः॑ । व्या॑वर्दे॒व्या म॒तिं वि रा॒तिं मर्त्ये॑भ्यः ॥ (१)
मैं अपनेआप को अश्चिनीकुमारों की ज्ञान वृद्धि के साथ रहने वाला मानता हूं. तुम मेरी बुद्धि को प्रकाशित करो तथा मनुष्यों के लिए धन दो. (१)
I consider myself to be living with the knowledge growth of the Ashwini Kumars. You enlighten My wisdom and give riches to men. (1)