हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 20.143.4

कांड 20 → सूक्त 143 → मंत्र 4 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 143
हि॑र॒ण्यये॑न पुरुभू॒ रथे॑ने॒मं य॒ज्ञं ना॑स॒त्योप॑ यातम् । पिबा॑थ॒ इन्मधु॑नः सो॒म्यस्य॒ दध॑थो॒ रत्नं॑ विध॒ते जना॑य ॥ (४)
हे अश्चिनीकुमारो! तुम सोने के बने हुए अपने रथ के द्वारा इस यज्ञशाला में आओ. तुम मधुर सोमरस पीते हुए इस सेवक पुरुष को रत्न और धन प्रदान करो. (४)
O Ashchini Kumaro! You come to this yagyashala through your chariot made of gold. You give gems and wealth to this servant man while drinking the sweet Someras. (4)