हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 20.17.10

कांड 20 → सूक्त 17 → मंत्र 10 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 17
गोभि॑ष्टरे॒माम॑तिं दु॒रेवां॒ यवे॑न॒ क्षुधं॑ पुरुहूत॒ विश्वा॑म् । व॒यं राज॑भिः प्रथ॒मा धना॑न्य॒स्माके॑न वृ॒जने॑ना जयेम ॥ (१०)
हे बहुतों के द्वारा स्तुति किए गए इंद्र! तुम्हारी कृपा को प्राप्त करते हुए हम यजमान तुम्हारे द्वारा दी गई गायों के कारण दरिद्रता को पार करें. तुम्हारे द्वारा दिए हुए अन्न से हम अपने लोगों की भूख दूर करें. तुम्हारी कृपा से हम अपने समान जनों में श्रेष्ठ हों तथा राजा से धन प्राप्त कर के अपने शत्रुओं को पराजित करें. (१०)
O Indra, praised by many! While receiving Your grace, let us host overcome poverty due to the cows given by you. Let us remove the hunger of our people with the food you give. By your grace, let us be superior among our like people and defeat our enemies by getting money from the king. (10)