हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 20.17.9

कांड 20 → सूक्त 17 → मंत्र 9 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 17
उज्जा॑यतां पर॒शुर्ज्योति॑षा स॒ह भू॒या ऋ॒तस्य॑ सु॒दुघा॑ पुराण॒वत् । वि रो॑चतामरु॒षो भा॒नुना॒ शुचिः॒ स्वर्ण शु॒क्रं शु॑शुचीत॒ सत्प॑तिः ॥ (९)
मेघ को विदीर्ण करने के लिए इंद्र का वज्र अपने तेज के साथ प्रकट हो तथा जल का दोहन करने वाली मध्यमा वाणी पहले के समान प्रकट हो तथा अपने तेज से प्रकाश वाली हो. सूर्य देव जिस प्रकार अपने ही तेज से प्रकाशित होते हैं, उसी प्रकार सज्जनों का पालन करने वाले इंद्र अत्यधिक दीप्त हों. (९)
To scatter the cloud, Indra's thunderbolt should appear with its brightness and the medium speech that exploits the water should appear as before and be light with its brightness. Just as the Sun God is illuminated with his own glory, in the same way, Indra, who follows gentlemen, should be highly bright. (9)