अथर्ववेद (कांड 20)
ते त्वा॒ मदा॑ अमद॒न्तानि॒ वृष्ण्या॑ ते॒ सोमा॑सो वृत्र॒हत्ये॑षु सत्पते । यत्का॒रवे॒ दश॑ वृ॒त्राण्य॑प्र॒ति ब॒र्हिष्म॑ते॒ नि स॒हस्रा॑णि ब॒र्हयः॑ ॥ (६)
हे सज्जनों के रक्षक इंद्र! शत्रुओं के हनन कर्म में प्रसिद्ध एवं मादक आज्य, पुरोडाश आदि तुम्हें प्रसन्न करें. हमारे प्रसिद्ध स्तोत्र भी प्रसन्नता के साधन होने के कारण तुम्हें हर्षित करें. प्रसिद्ध सोमरस भी तुम्हें प्रसन्न करें. स्तुति करते हुए यजमान के दस सहस्र पापों को तुम समाप्त करो. (६)
O Indra, protector of gentlemen! May famous and intoxicating ajya, purodash etc. please you in the work of enemies. May our famous hymns also make you happy because they are a means of happiness. May the famous Somers also please you. By praising, put an end to the host's ten thousand sins. (6)