हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 20.31.5

कांड 20 → सूक्त 31 → मंत्र 5 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 31
उ॒त स्म॒ सद्म॑ हर्य॒तस्य॑ प॒स्त्योरत्यो॒ न वाजं॒ हरि॑वाँ अचिक्रदत् । म॒ही चि॒द्धि धि॒षणाह॑र्य॒दोज॑सा बृ॒हद्वयो॑ दधिषे हर्य॒तश्चि॒दा ॥ (५)
इंद्र का निवास द्यावा पृथ्वी में है. जिस प्रकार घोड़ा युद्ध क्षेत्र में अग्रसर होता है, उसी प्रकार इंद्र अपने घोड़ों पर चढ़ कर यज्ञशाला की ओर बढ़ते हैं. हे इंद्र! हमारा स्तोत्र तुम्हारी कामना करता है. तुम भी यजमान की कामना करते हुए उसे असीमित धन देते हो. (५)
Indra's residence is in the earth. Just as the horse moves in the war zone, Indra climbs on his horses and moves towards the Yagyashala. O Indra! Our hymn wishes you. You also wish the host and give him unlimited money. (5)