हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 20.34.1

कांड 20 → सूक्त 34 → मंत्र 1 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 34
यो जा॒त ए॒व प्र॑थ॒मो मन॑स्वान्दे॒वो दे॒वान्क्रतु॑ना प॒र्यभू॑षत् । यस्य॒ शुष्मा॒द्रोद॑सी॒ अभ्य॑सेतां नृ॒म्णस्य॑ म॒ह्ना स ज॑नास॒ इन्द्रः॑ ॥ (१)
इंद्र के बल से आकाश और पृथ्वी भयभीत रहते हैं. इंद्र ने प्रकट होते ही अन्य देवताओं को अपनी रक्षा में ले लिया. (१)
The sky and earth are frightened by the force of Indra. As soon as Indra appeared, he took the other gods into his defense. (1)