हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 34
यो जा॒त ए॒व प्र॑थ॒मो मन॑स्वान्दे॒वो दे॒वान्क्रतु॑ना प॒र्यभू॑षत् । यस्य॒ शुष्मा॒द्रोद॑सी॒ अभ्य॑सेतां नृ॒म्णस्य॑ म॒ह्ना स ज॑नास॒ इन्द्रः॑ ॥ (१)
इंद्र के बल से आकाश और पृथ्वी भयभीत रहते हैं. इंद्र ने प्रकट होते ही अन्य देवताओं को अपनी रक्षा में ले लिया. (१)
The sky and earth are frightened by the force of Indra. As soon as Indra appeared, he took the other gods into his defense. (1)

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 34
यः पृ॑थि॒वीं व्यथ॑माना॒मदृं॑ह॒द्यः पर्व॑ता॒न्प्रकु॑पिताँ॒ अर॑म्णात् । यो अ॒न्तरि॑क्षं विम॒मे वरी॑यो॒ यो द्या॒मस्त॑भ्ना॒त्स ज॑नास॒ इन्द्रः॑ ॥ (२)
हे असुर! इंदर वे हैं, जिन्होंने हिलती हुई भूमि को स्थिर किया, पंखों वाले पर्वतों के पंख काट कर उन्हें अचल बना दिया तथा अंतरिक्ष और आकाश को स्थिर किया. (२)
O asur! Inder is the one who stabilized the shaking land, cut the wings of the winged mountains and made them immovable and stabilized space and the sky. (2)

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 34
यो ह॒त्वाहि॒मरि॑णात्स॒प्त सिन्धू॒न्यो गा उ॒दाज॑दप॒धा व॒लस्य॑ । यो अश्म॑नोर॒न्तर॒ग्निं ज॑जान सं॒वृक्स॒मत्सु॒ स ज॑नास॒ इन्द्रः॑ ॥ (३)
जिन्होंने आकाश में विचरण करने वाले मेघ का भेदन कर के नदियों को प्रवाहित किया तथा बल असुर द्वारा चुराई गई गायों को प्रकट किया, जिन्होंने मेघों में भरे हुए पाषाणों से विद्युत को उत्पन्न किया तथा जो युद्धं में शत्रुओं का विनाश करते हैं, वे ही इंद्र हैं. (३)
Those who pierced the clouds moving in the sky and flowed the rivers and revealed the cows stolen by the force asura, who generated electricity from the stones filled in the clouds and who destroy the enemies in the war, they are Indra. (3)

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 34
येने॒मा विश्वा॒ च्यव॑ना कृ॒तानि॒ यो दासं॒ वर्ण॒मध॑रं॒ गुहाकः॑ । श्व॒घ्नीव॒ यो जि॑गी॒वां ल॒क्षमाद॑द॒र्यः पु॒ष्टानि॒ स ज॑नास॒ इन्द्रः॑ ॥ (४)
हे असुरो! जिन्होंने दिखाई देते हुए लोकों को स्थिर किया, असुरों को गुफाओं में डाल दिया, प्रत्यक्ष शत्रुओं पर विजय प्राप्त की तथा जो शत्रु के धनों को छीन लेते हैं, वे ही इंद्र हैं. (४)
O Asuro! Those who stabilized the visible worlds, put the asuras in caves, conquered the direct enemies and those who take away the enemy's wealth are Indra. (4)

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 34
यं स्मा॑ पृ॒च्छन्ति॒ कुह॒ सेति॑ घो॒रमु॒तेमा॑हु॒र्नैषो अ॒स्तीत्ये॑नम् । सो अ॒र्यः पु॒ष्टीर्विज॑ इ॒वा मि॑नाति॒ श्रद॑स्मै धत्त॒ स ज॑नास॒ इन्द्रः॑ ॥ (५)
शत्रुओं का विनाश करने वाले इंद्र के संबंध में लोग अनेक शंकाएं करते हैं. इंद्र शत्रुओं की रक्षा करने वाली सेनाओं का पूर्ण नाश कर देते हैं. हे मनुष्यो! उन इंद्र पर विश्वास करो तथा उन के प्रति श्रद्धावान बनो. इंद्र के अतिरिक्त वृत्रासुर आदि शत्रुओं को कौन जीत सकता था. वे इंद्र शत्रु विजेता हैं. (५)
People have many doubts about Indra, who destroys enemies. Indra completely destroys the armies that protect the enemies. O men! Believe in that Indra and be reverential to him. Apart from Indra, who could have conquered enemies like Vritrasura etc. They are indra enemy conquerors. (5)

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 34
यो र॒ध्रस्य॑ चोदि॒ता यः कृ॒शस्य॒ यो ब्र॒ह्मणो॒ नाध॑मानस्य की॒रेः । यु॒क्तग्रा॑व्णो॒ योऽवि॒ता सु॑शि॒प्रः सु॒तसो॑मस्य॒ स ज॑नास॒ इन्द्रः॑ ॥ (६)
जो इंद्र निर्धनों को धन देते हैं और असहायों की सहायता करते हैं, जो स्तुति करने वाले ब्राह्मणों को मनचाहा फल प्रदान करते हैं, जिन की चिबुक अर्थात्‌ ठुड्डी सुंदर है तथा जो सोम का संस्कार करने वाले यजमानों के रक्षक हैं, हे मनुष्यो! वे ही इंद्र हैं. (६)
Indra, who gives money to the poor and helps the helpless, who gives the desired results to the praising Brahmins, whose chin is beautiful and who is the protector of the hosts who perform the sacrament of Soma, O men! He is Indra. (6)

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 34
यस्याश्वा॑सः प्र॒दिशि॒ यस्य॒ गावो॒ यस्य॒ ग्रामा॒ यस्य॒ विश्वे॒ रथा॑सः । यः सूर्यं॒ य उ॒षसं॑ ज॒जान॒ यो अ॒पां ने॒ता स ज॑नास॒ इन्द्रः॑ ॥ (७)
जिन के पास मांगने वालों को देने के लिए बहुत सी गाएं, अश्व, ग्राम, रथ, गज, ऊंट आदि सब कुछ है, जिन्होंने प्रकाश के लिए सूर्य का उदय किया है तथा उषा को प्रकट किया है, जो वर्षा के जल के प्रेरक हैं, वे ही इंद्र हैं. (७)
Those who have many cows, horses, villages, chariots, yards, camels, etc. to give to those who ask for it, who have risen the sun for light and revealed Usha, who are the originators of rain water, are Indra. (7)

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 34
यं क्रन्द॑सी संय॒ती वि॒ह्वये॑ते॒ परेऽव॑र उ॒भया॑ अ॒मित्राः॑ । स॑मा॒नं चि॒द्रथ॑मातस्थि॒वांसा॒ नाना॑ हवेते॒ स ज॑नास॒ इन्द्रः॑ ॥ (८)
आकाश और पृथ्वी दोनों एकमत हो कर इंद्र का आह्वान करते हैं. द्युलोक हवि के लिए तथा पृथ्वी वर्षा के लिए इंद्र को बुलाते हैं. समान रथ में बैठे हुए सेनापति जिन्हें बुलाते हैं, वे ही इंद्र हैं. (८)
Both the sky and the earth unanimously invoke Indra. Dulok calls Indra for Havi and Earth for rain. The commanders sitting in the same chariot call him are Indra. (8)
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