हरि ॐ
अथर्ववेद (Atharvaved)
अथर्ववेद (कांड 20)
आ नो॑ याहि सु॒ताव॑तो॒ऽस्माकं॑ सुष्टु॒तीरुप॑ । पिबा॒ सु शि॑प्रि॒न्रन्ध॑सः ॥ (१)
हे इंद्र! सोम को निचोड़ने वाले हम यजमानों के समीप आओ. हम शोभन स्तुतियों वाले हैं. हे सुंदर ठोड़ी वाले इंद्र! सोमरस का पान करो. (१)
O Indra! Come closer to the hosts who squeeze Som. We are well-praised. O beautiful chin indra! Drink somers. (1)
अथर्ववेद (कांड 20)
आ ते॑ सिञ्चामि कु॒क्ष्योरनु॒ गात्रा॒ वि धा॑वतु । गृ॑भा॒य जि॒ह्वया॒ मधु॑ ॥ (२)
हे इंद्र! मैं तुम्हारी दोनों कोखों को सोमरस से भरता हूं. यह सोमरस तुम्हारी नाड़ियों में बहे. तुम मधु वाले सोमरस को अपनी जीभ से ग्रहण करो. (२)
O Indra! I fill both your wombs with somers. May this someras flow into your veins. You take the madhu ful someras with your tongue. (2)
अथर्ववेद (कांड 20)
स्वा॒दुष्टे॑ अस्तु सं॒सुदे॒ मधु॑मान्त॒न्वे॒ तव॑ । सोमः॒ शम॑स्तु ते हृ॒दे ॥ (३)
हे उत्तम दान करने वाले इंद्र! मेरे द्वारा दिया हुआ सोम तुम्हारे लिए स्वादिष्ट हो. इस के बाद यह सोम तुम्हारे शरीर के लिए सुख देने वाला हो. (३)
O best donor Indra! The Mon given by me is delicious for you. After this, this Som is going to give happiness to your body. (3)