हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 4
आ नो॑ याहि सु॒ताव॑तो॒ऽस्माकं॑ सुष्टु॒तीरुप॑ । पिबा॒ सु शि॑प्रि॒न्रन्ध॑सः ॥ (१)
हे इंद्र! सोम को निचोड़ने वाले हम यजमानों के समीप आओ. हम शोभन स्तुतियों वाले हैं. हे सुंदर ठोड़ी वाले इंद्र! सोमरस का पान करो. (१)
O Indra! Come closer to the hosts who squeeze Som. We are well-praised. O beautiful chin indra! Drink somers. (1)

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 4
आ ते॑ सिञ्चामि कु॒क्ष्योरनु॒ गात्रा॒ वि धा॑वतु । गृ॑भा॒य जि॒ह्वया॒ मधु॑ ॥ (२)
हे इंद्र! मैं तुम्हारी दोनों कोखों को सोमरस से भरता हूं. यह सोमरस तुम्हारी नाड़ियों में बहे. तुम मधु वाले सोमरस को अपनी जीभ से ग्रहण करो. (२)
O Indra! I fill both your wombs with somers. May this someras flow into your veins. You take the madhu ful someras with your tongue. (2)

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 4
स्वा॒दुष्टे॑ अस्तु सं॒सुदे॒ मधु॑मान्त॒न्वे॒ तव॑ । सोमः॒ शम॑स्तु ते हृ॒दे ॥ (३)
हे उत्तम दान करने वाले इंद्र! मेरे द्वारा दिया हुआ सोम तुम्हारे लिए स्वादिष्ट हो. इस के बाद यह सोम तुम्हारे शरीर के लिए सुख देने वाला हो. (३)
O best donor Indra! The Mon given by me is delicious for you. After this, this Som is going to give happiness to your body. (3)