हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 20.44.3

कांड 20 → सूक्त 44 → मंत्र 3 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 44
तं सु॑ष्टु॒त्या वि॑वासे ज्येष्ठ॒राजं॒ भरे॑ कृ॒त्नुम् । म॒हो वा॒जिनं॑ स॒निभ्यः॑ ॥ (३)
मैं इंद्र को अपनी स्तुति से प्रसन्न करता हूं. इंद्र तेजस्वी शत्रुओं का भी हनन करने वाले हैं. वे स्तुति करने वालों को अन्न तथा यश प्रदान करते हैं. मैं इंद्र को हवि भी प्रदान करता हूं. (३)
I please Indra with my praise. Indra is also going to violate the bright enemies. They give food and fame to those who praise. I also provide havi to Indra. (3)