हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 46
प्र॑णे॒तारं॒ वस्यो॒ अच्छा॒ कर्ता॑रं॒ ज्योतिः॑ स॒मत्सु॑ । सा॑स॒ह्वांसं॑ यु॒धामित्रा॑न् ॥ (१)
वे इंद्र नेता, युद्ध क्षेत्र में शत्रुओं को वश में करने वाले और यज्ञो में प्रकाश करने वाले हैं. (१)
He is the leader of Indra, the one who subdues the enemies in the war zone and the one who illuminates the yagnas. (1)

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 46
स नः॒ पप्रिः॑ पारयाति स्व॒स्ति ना॒वा पु॑रुहू॒तः । इन्द्रो॒ विश्वा॒ अति॒ द्विषः॑ ॥ (२)
इंद्र अपनी कल्याणकारिणी नाव के द्वारा हमें पार लगाते हुए शत्रुओं से हमारी रक्षा करें. (२)
May Indra cross us through his Kalyankarini boat and protect us from enemies. (2)

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 46
स त्वं न॑ इन्द्र॒ वाजे॑भिर्दश॒स्या च॑ गातु॒या च॑ । अछा॑ च नः सु॒म्नं ने॑षि ॥ (३)
हे इंद्र! तुम अपनी दसों उंगलियों से हमारे सामने उस सुख को लाते हो, जो अन्न आदि से संपन्न है. (३)
O Indra! You bring before us the happiness that is rich in food etc. with your ten fingers. (3)