अथर्ववेद (कांड 20)
अ॒भि त्वा॒ वर्च॑सा॒ गिरः॑ सि॒ञ्चन्ती॒राच॑र॒ण्यवः॑ । अ॒भि व॒त्सं न धे॒नवः॑ ॥ (१)
विचरण करने वाली गाएं, जिस प्रकार अपने बछड़ों के पास जाती हैं, उसी प्रकार हमारी वाणी तुम्हें प्राप्त होती है और तुम्हें सींचती हैं. (१)
Just as the moving cows go to their calves, so our voice receives you and waters you. (1)