अथर्ववेद (कांड 20)
द्यु॒क्षं सु॒दानुं॒ तवि॑षीभि॒रावृ॑तं गि॒रिं न पु॑रु॒भोज॑सम् । क्षु॒मन्तं॒ वाजं॑ श॒तिनं॑ सह॒स्रिणं॑ म॒क्षू गोम॑न्तमीमहे ॥ (५)
दुर्भिक्ष के समय जिस प्रकार सभी जीवधारी कंद, मूल और फल वाले पर्वत की स्तुति करते हैं, उसी प्रकार हम उस की स्तुति करते हैं जो दान करने योग्य, पोषक, गायों से युक्त एवं तेजपूर्ण होता है. (५)
Just as all living beings praise a mountain with tubers, roots and fruits at the time of famine, we praise one who is charitable, nutritious, full of cows and radiant. (5)