हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 20.53.2

कांड 20 → सूक्त 53 → मंत्र 2 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 53
दा॒ना मृ॒गो न वा॑र॒णः पु॑रु॒त्रा च॒रथं॑ दधे । नकि॑ष्ट्वा॒ नि य॑म॒दा सु॒ते ग॑मो म॒हाँश्च॑र॒स्योज॑सा ॥ (२)
हे इंद्र! रथ में बैठ कर तुम हर्षित मृग के समान अनेक प्रकार से गमन करते हो. तुम्हारे गमन को रोकने में कोई भी समर्थ नहीं है. तुम अपनी शक्ति के कारण महान हो. हमारे द्वारा सोमरस तैयार किए जाने पर तुम यहां आओ. (२)
O Indra! Sitting in a chariot, you travel in many ways like a joyful antelope. No one is able to stop your movement. You are great because of your power. You come here when we prepare Somers. (2)