हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 20.57.15

कांड 20 → सूक्त 57 → मंत्र 15 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 57
स्वर॑न्ति त्वा सु॒ते नरो॒ वसो॑ निरे॒क उ॒क्थिनः॑ । क॒दा सु॒तं तृ॑षा॒ण ओक॒ आ ग॑म॒ इन्द्र॑ स्व॒ब्दीव॒ वंस॑गः ॥ (१५)
हे इंद्र! सोमरस तैयार हो जाने पर उकथ मंत्रों का गान करने वाले ऋत्विज्‌ तुम्हें बुला रहे हैं. प्यासे बैल के समान आप कब हमारा सोमरस पीने के लिए हमारे यज्ञ में पधारेंगे. (१५)
O Indra! When Someras is ready, Ritvij, who sings ukath mantras, is calling you. Like a thirsty bull, when will you come to our yagna to drink our someras? (15)