हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 57
सु॑रूपकृ॒त्नुमू॒तये॑ सु॒दुघा॑मिव गो॒दुहे॑ । जु॑हू॒मसि॒ द्यवि॑द्यवि ॥ (१)
जिस प्रकार गाय को दुहने के लिए गोदोहक को बुलाया जाता है, उसी प्रकार प्रत्येक अवसर पर अपनी रक्षा के लिए हम इंद्र का आह्वान करते हैं. (१)
Just as Godohak is called to milk a cow, so on every occasion we invoke Indra to protect ourselves. (1)

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 57
उप॑ नः॒ सव॒ना ग॑हि॒ सोम॑स्य सोमपाः पिब । गो॒दा इद्रे॒वतो॒ मदः॑ ॥ (२)
सदा हर्षित रहने वाले एवं धनवान इंद्र गाएं प्रदान करने वाले हैं. हे इंद्र हमारे सोमयाग में आ कर तुम सोमरस का पान करो. (२)
The ever-happy and wealthy Indra is the one who provides cows. O Indra, come to our Somayag and drink Someras. (2)

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 57
अथा॑ ते॒ अन्त॑मानां वि॒द्याम॑ सुमती॒नाम् । मा नो॒ अति॑ ख्य॒ आ ग॑हि ॥ (३)
हे इंद्र! हम तुम्हारी उत्तम बुद्धि को जानते हैं. तुम दूसरों के द्वारा हमारी निंदा मत कराओ तथा हमारे यज्ञ में पधारो. (३)
O Indra! We know your best intellect. Do not condemn us by others and come to our sacrifice. (3)

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 57
शु॒ष्मिन्त॑मं न ऊ॒तये॑ द्यु॒म्निनं॑ पाहि॒ जागृ॑विम् । इन्द्र॒ सोमं॑ शतक्रतो ॥ (४)
हे सैकड़ों कर्मों वाले इंद्र! तुम हमारी रक्षा के लिए शक्ति बढ़ाने वाले इस सोमरस का पान करो. (४)
O Indra of hundreds of deeds! You drink this somras that increases strength to protect us. (4)

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 57
इ॑न्द्रि॒याणि॑ शतक्रतो॒ या ते॒ जने॑षु प॒ञ्चसु॑ । इन्द्र॒ तानि॑ त॒ आ वृ॑णे ॥ (५)
हे बहुत से कमों वाले इंद्र! मैं उन शक्तियों का वरण करता हूं जो देवता, पितर आदि में हैं. (५)
O Indra of many shortcomings! I choose the powers that are in the deity, pitar etc. (5)

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 57
अग॑न्निन्द्र॒ श्रवो॑ बृ॒हद्द्यु॒म्नं द॑धिष्व दु॒ष्टर॑म् । उत्ते॒ शुष्मं॑ तिरामसि ॥ (६)
हे इंद्र! तुम्हारा असीमित बल हमें प्राप्त हो. तुम हमें वह दमकता हुआ धन प्रदान करो जो शत्रुओं से संघर्ष होने पर हमें विजय दिला सके. हम अपने इस स्तोत्र के द्वारा सोमरस की वृद्धि करते हुए तुम्हें शक्तिशाली बनाते हैं. (६)
O Indra! May we receive your unlimited strength. You give us the shining money that can give us victory when we fight with enemies. We make you powerful by increasing Somras through this hymn of ours. (6)

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 57
अ॑र्वा॒वतो॑ न॒ आ ग॒ह्यथो॑ शक्र परा॒वतः॑ । उ॑ लो॒को यस्ते॑ अद्रिव॒ इन्द्रे॒ह त॑त॒ आ ग॑हि ॥ (७)
हे इंद्र! तुम दूर या पास जहां कहीं हो, वहीं से हमारे समीप आओ. हे वज्रधारी इंद्र! तुम अपने उत्कृष्ट स्वर्गलोक से भी सोमरस पीने के लिए हमारे यज्ञ में आओ. (७)
O Indra! Come to us from wherever you are far or near. O Vajradhari Indra! You come to our yagna to drink someras even from your excellent paradise. (7)

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 57
इन्द्रो॑ अ॒ङ्ग म॒हद्भ॒यम॒भी षदप॑ चुच्यवत् । स हि स्थि॒रो विच॑र्षणिः ॥ (८)
हे ऋत्विज्‌! इंद्र बड़े से बड़े भय को भी दूर कर देते हैं. उन सूर्य द्रष्टा अर्थात्‌ सब को देखने वाले इंद्र को कोई पराजित नहीं कर सकता. (८)
O Ritvij! Indra removes even the biggest fear. No one can defeat that sun seer, that is, Indra, who sees everyone. (8)
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