हरि ॐ
अथर्ववेद (Atharvaved)
Home » Atharvaved » Kand 20 » Sukta 6 अथर्ववेद (कांड 20) इन्द्र॑ त्वा वृष॒भं व॒यं सु॒ते सोमे॑ हवामहे । स पा॑हि॒ मध्वो॒ अन्ध॑सः ॥ (१)
हे कामनाओं की वर्षा करने वाले इंद्र! हम यजमान निचोड़े हुए सोम को पीने के लिए तुम्हें बुलाते हैं. तुम मधुर सोम का पान करो. (१)
O Indra, who showers desires! We call you to drink the host squeezed Mon. You drink sweet soma. (1)
अथर्ववेद (कांड 20) इन्द्र॑ क्रतु॒विदं॑ सु॒तं सोमं॑ हर्य पुरुष्टुत । पिबा वृ॑षस्व॒ तातृ॑पिम् ॥ (२)
हे अनेक यजमानों द्वारा स्तुति किए गए इंद्र! यज्ञ को पूर्ण करने वाला यह सोम निचोड़ा गया है. तुम तृप्त करने वाले इस सोमरस का दान करो. तुम इस सोम को पेट भर कर पियो. (२)
O Indra praised by many hosts! This Som, which completes the yajna, has been squeezed. Donate this satisfying someras. You drink this Mon full of stomach. (2)
अथर्ववेद (कांड 20) इन्द्र॒ प्र णो॑ धि॒तावा॑नं य॒ज्ञं विश्वे॑भिर्दे॒वेभिः॑ । ति॒र स्त॑वान विश्पते ॥ (३)
हे स्तुति किए गए एवं मरुतों के स्वामी इंद्र! तुम सब देवों के साथ हमारे इस सोममय यज्ञ में आ कर हवि ग्रहण करो तथा हमारे यज्ञ की वृद्धि करो. (३)
O Swami of the praises and maruts, Indra! Come to this Sommaya Yagya of ours with all of you gods and take havi and increase our yajna. (3)
अथर्ववेद (कांड 20) इन्द्र॒ सोमाः॑ सु॒ता इ॒मे तव॒ प्र य॑न्ति सत्पते । क्षयं॑ च॒न्द्रास॒ इन्द॑वः ॥ (४)
हे यजमानों का पालन करने वाले इंद्र! निचोड़ा गया और चंद्रमा की किरणों के समान सुख देने वाला यह सोम तुम्हारे पेट में जाता है. (४)
O Indra who follows the hosts! This Soma, which is squeezed and gives pleasure like the rays of the moon, goes into your stomach. (4)
अथर्ववेद (कांड 20) द॑धि॒ष्वा ज॒ठरे॑ सु॒तं सोम॑मिन्द्र॒ वरे॑ण्यम् । तव॑ द्यु॒क्षास॒ इन्द॑वः ॥ (५)
हे इंद्र! वरण करने योग्य एवं निचोड़े गए इस सोम को अपने पेट में धारण करो. दीप्ति वाले सोम तुम्हारे विशेष भाग हैं. (५)
O Indra! Wear this selectable and squeezed soma in your stomach. Deepthy Som is your special part. (5)
अथर्ववेद (कांड 20) गिर्व॑णः पा॒हि नः॑ सु॒तं मधो॒र्धारा॑भिरज्यसे । इन्द्र॒ त्वादा॑त॒मिद्यशः॑ ॥ (६)
हे स्तुतियों द्वारा पूजन करने योग्य इंद्र! तुम हमारे द्वारा निचोड़े गए सोम को पियो. तुम मधुर सोम की धाराओं के द्वारा भिगोए जाते हो. हे इंद्र! यह सोम तुम्हारे यश का रूप है. (६)
O Indra worthy of worship by eulogies! You drink the mon squeezed by us. You are soaked by the streams of sweet soma. O Indra! This Mon is the form of your fame. (6)
अथर्ववेद (कांड 20) अ॒भि द्यु॒म्नानि॑ व॒निन॒ इन्द्रं॑ सचन्ते॒ अक्षि॑ता । पी॒त्वी सोम॑स्य वावृधे ॥ (७)
यजमान का उज्ज्वल सोम इंद्र को भी सभी ओर से प्राप्त हो रहा है. इस सोम का पान करते हुए इंद्र वृद्धि प्राप्त करें. (७)
The bright Som of the host is also getting Indra from all sides. Get Indra growth while drinking this Som. (7)
अथर्ववेद (कांड 20) अ॑र्वा॒वतो॑ न॒ आ ग॑हि परा॒वत॑श्च वृत्रहन् । इ॒मा जु॑षस्व नो॒ गिरः॑ ॥ (८)
हे वृत्र असुर के हंता इंद्र! तुम समीपवर्ती देश से तथा दूरवर्ती देश से हम यजमानों के समीप आओ और आ कर हमारी इन स्तुतियों को स्वीकार करो. (८)
O Swami Indra, the son of The Demon! Come close to us hosts from a nearby country and from a distant land and accept our praises. (8)