हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 20.6.8

कांड 20 → सूक्त 6 → मंत्र 8 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 6
अ॑र्वा॒वतो॑ न॒ आ ग॑हि परा॒वत॑श्च वृत्रहन् । इ॒मा जु॑षस्व नो॒ गिरः॑ ॥ (८)
हे वृत्र असुर के हंता इंद्र! तुम समीपवर्ती देश से तथा दूरवर्ती देश से हम यजमानों के समीप आओ और आ कर हमारी इन स्तुतियों को स्वीकार करो. (८)
O Swami Indra, the son of The Demon! Come close to us hosts from a nearby country and from a distant land and accept our praises. (8)