हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 65
एतो॒ न्विन्द्रं॒ स्तवा॑म॒ सखा॑यः॒ स्तोम्यं॒ नर॑म् । कृ॒ष्टीर्यो विश्वा॑ अ॒भ्य॒स्त्येक॒ इत् ॥ (१)
हम स्तुति के योग्य एवं अपने सखा के समान इंद्र से इधर आने के लिए स्तुति करते हैं. ये इंद्र सभी कर्मो के फल प्रदान करते हैं. (१)
We praise Indra for coming here like our friend and worthy of praise. This Indra provides the fruits of all karma. (1)

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 65
अगो॑रुधाय ग॒विषे॑ द्यु॒क्षाय॒ दस्म्यं॒ वचः॑ । घृ॒तात्स्वादी॑यो॒ मधु॑नश्च वोचत ॥ (२)
हे स्तोताओ! इन तेजस्वी, देखने योग्य वाणी रूपी अन्न वाले तथा गायों को न रोकने वाले इंद्र के प्रति शहद और घी से भी अधिक मधुर वाणी का उच्चारण करो. (२)
O stotao! Pronounce a sweeter voice than honey and ghee towards Indra, who has food in the form of these bright, observable speeches and does not stop cows. (2)

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 65
यस्यामि॑तानि वी॒र्या॒ न राधः॒ पर्ये॑तवे । ज्योति॒र्न विश्व॑म॒भ्यस्ति॒ दक्षि॑णा ॥ (३)
कार्य साधन के हेतु असीमित शक्ति वाले इंद्र दीप्तिमती दक्षिणा के रूप हैं. (३)
Indra Deeptimati with unlimited power for work is the form of Dakshina. (3)