हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 66
स्तु॒हीन्द्रं॑ व्यश्व॒वदनू॑र्मिं वा॒जिनं॒ यम॑म् । अ॒र्यो गयं॒ मंह॑मानं॒ वि दा॒शुषे॑ ॥ (१)
हे ऋत्विजो! जो इंद्र अपने रथ से घोड़ों को खोल कर शांत भाव से यज्ञ में बैठते हैं उन्हीं प्रशंसा के योग्य इंद्र की स्तुति यजमान की कल्याण कामना के लिए करो. (१)
O Ritvijo! The Indra who opens the horses from his chariot and sits in the yagna calmly, praise Indra worthy of praise for the welfare of the host. (1)

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 66
ए॒वा नू॒नमुप॑ स्तुहि॒ वैय॑श्व दश॒मं नव॑म् । सुवि॑द्वांसं च॒र्कृत्यं॑ च॒रणी॑नाम् ॥ (२)
जो इंद्र सदा नवीन, महान और मेधावी हैं, हे यजमान! तुम उन्हीं इंद्र की पूजा करो. (२)
Indra, who is always new, great and meritorious, O host! You worship the same Indra. (2)

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 66
वेत्था॒ हि निरृ॑तीनां॒ वज्र॑हस्त परि॒वृज॑म् । अह॑रहः शु॒न्ध्युः प॑रि॒पदा॑मिव ॥ (३)
हे वज्रधारी इंद्र! जिस प्रकर आदित्य अपने सहयोगियों को जानते हैं, उसी प्रकार तुम भी संतप्त करने वाले और शक्तिशाली असुरों को जानते हो. (३)
O Vajradhari Indra! Just as Aditya knows his colleagues, you also know the angry and powerful asuras. (3)