अथर्ववेद (कांड 20)
मो षु वो॑ अ॒स्मद॒भि तानि॒ पौंस्या॒ सना॑ भूवन्द्यु॒म्नानि॒ मोत जा॑रिषुर॒स्मत्पु॒रोत जा॑रिषुः । यद्व॑श्चि॒त्रं यु॒गेयु॑गे॒ नव्यं॒ घोषा॒दम॑र्त्यम् । अ॒स्मासु॒ तन्म॑रुतो॒ यच्च॑ दु॒ष्टरं॑ दिधृ॒ता यच्च॑ दु॒ष्टर॑म् ॥ (२)
हे मरुतो! तुम्हारा तेज संताप देने वाला है. वह हमारे सामने आ कर हमें जीर्ण न करे. तुम अपने नवीन, चयन योग्य और अविनाशी उस बल को हम में स्थापित करो, जिसे शत्रु कभी प्राप्त नहीं कर सकते. (२)
O Maruto! Your sharpness is going to be annoying. He should not come in front of us and ruin us. You establish in us your new, selectable and indestructible force that enemies can never achieve. (2)