हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 20.67.3

कांड 20 → सूक्त 67 → मंत्र 3 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 67
अ॒ग्निं होता॑रं मन्ये॒ दास्व॑न्तं॒ वसुं॑ सू॒नुं सह॑सो जा॒तवे॑दसं॒ विप्रं॒ न जा॒तवे॑दसम् । य ऊ॒र्ध्वया॑ स्वध्व॒रो दे॒वो दे॒वाच्या॑ कृ॒पा । घृ॒तस्य॒ विभ्रा॑ष्टि॒मनु॑ वष्टि शो॒चिषा॒ जुह्वा॑नस्य स॒र्पिषः॑ ॥ (३)
अग्नि देव बल देने वाले, देवों के होता, उत्पन्न हुओं के जानने वाले तथा बल के अनुज हैं. वे अपनी ज्वालाओं से यज्ञ को सुसज्जित करते हैं तथा होम अग्नि में डाली गई घृत की बूंदों तथा उन की दीप्ति की कामना करते हैं. (३)
Agni Dev is the giver of power, the creator of the gods, the knower of the beings and the source of force. They decorate the yajna with their flames and wish for the drops of hatred poured into the home agni and their light. (3)