हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 20.73.5

कांड 20 → सूक्त 73 → मंत्र 5 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 73
सो चि॒न्नु वृ॒ष्टिर्यू॒थ्या॒ स्वा सचाँ॒ इन्द्रः॒ श्मश्रू॑णि॒ हरि॑ता॒भि प्रु॑ष्णुते । अव॑ वेति सु॒क्षयं॑ सु॒ते मधूदिद्धू॑नोति॒ वातो॒ यथा॒ वन॑म् ॥ (५)
सोमरस के निचोड़े जाने पर इंद्र हमारे यज्ञ मंडप में आते हैं. वायु जिस प्रकार वन को कंपित करता है, इंद्र उसी प्रकार मेघ को कंपित कर देते हैं. (५)
Indra comes to our Yagya Mandap when Someras is squeezed. Just as air vibrates the forest, Indra staggers the cloud in the same way. (5)