हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 73
तुभ्येदि॒मा सव॑ना शूर॒ विश्वा॒ तुभ्यं॒ ब्रह्मा॑णि॒ वर्ध॑ना कृणोमि । त्वं नृभि॒र्हव्यो॑ वि॒श्वधा॑सि ॥ (१)
हे वीर इंद्र! यज्ञ के सभी सवन तुम्हारे निमित्त हों. तुम्हारे निमित्त ही मैं उन मंत्रों का पाठ करता हूं. तुम सब के पोषक एवं आह्वान के योग्य हो. (१)
O heroic Indra! May all the songs of yajna be for you. It is for you that I recite those mantras. You are worthy of all the nourishment and call. (1)

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 73
नू चि॒न्नु ते॒ मन्य॑मानस्य द॒स्मोद॑श्नुवन्ति महि॒मान॑मुग्र । न वी॒र्यमिन्द्र ते॒ न राधः॑ ॥ (२)
हे इंद्र! तुम उग्र हो. तुम्हारा सुंदर रूप, शक्ति, धन और महिमा को दूसरा कोई भी प्राप्त नहीं कर सकता. (२)
O Indra! You're furious. No one else can get your beautiful form, power, wealth and glory. (2)

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 73
प्र वो॑ म॒हे म॑हि॒वृधे॑ भरध्वं॒ प्रचे॑तसे॒ प्र सु॑म॒तिं कृ॑णुध्वम् । विशः॑ पू॒र्वीः प्र च॑रा चर्षणि॒प्राः ॥ (३)
हे यजन करने वालो! तुम अपनी हवियों के द्वारा इंद्र को प्रसन्न करो. इंद्र मनुष्यों को मन चाहे फल प्रदान करते हैं. हे इंद्र! तुम मेरे हवि रूप अन्न का सेवन करो. (३)
O you who do it! Please Indra with your lusts. Indra provides human beings with the fruits they want. O Indra! You eat food in my form. (3)

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 73
य॒दा वज्रं॒ हिर॑ण्य॒मिदथा॒ रथं॒ हरी॒ यम॑स्य॒ वह॑तो॒ वि सू॒रिभिः॑ । आ ति॑ष्ठति म॒घवा॒ सन॑श्रुत॒ इन्द्रो॒ वाज॑स्य दी॒र्घश्र॑वस॒स्पतिः॑ ॥ (४)
इंद्र के हरे रंग के घोड़े इंद्र के स्वर्णिम वज्र को एवं रथ बंधी रस्सियों के सहारे रथ को खींचते हैं. उस अवसर पर अत्यधिक तेज वाले इंद्र उस रथ पर बैठते हैं. (४)
Indra's green horses pull indra's golden thunderbolt and the chariot with the help of tied ropes. On that occasion, Indra, who is very fast, sits on that chariot. (4)

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 73
सो चि॒न्नु वृ॒ष्टिर्यू॒थ्या॒ स्वा सचाँ॒ इन्द्रः॒ श्मश्रू॑णि॒ हरि॑ता॒भि प्रु॑ष्णुते । अव॑ वेति सु॒क्षयं॑ सु॒ते मधूदिद्धू॑नोति॒ वातो॒ यथा॒ वन॑म् ॥ (५)
सोमरस के निचोड़े जाने पर इंद्र हमारे यज्ञ मंडप में आते हैं. वायु जिस प्रकार वन को कंपित करता है, इंद्र उसी प्रकार मेघ को कंपित कर देते हैं. (५)
Indra comes to our Yagya Mandap when Someras is squeezed. Just as air vibrates the forest, Indra staggers the cloud in the same way. (5)

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 73
यो वा॒चा विवा॑चो मृ॒ध्रवा॑चः पु॒रू स॒हस्राशि॑वा ज॒घान॑ । तत्त॒दिद॑स्य॒ पौंस्यं॑ गृणीमसि पि॒तेव॒ यस्तवि॑षीं वावृ॒धे शवः॑ ॥ (६)
इंद्र दुष्कर्म करने वालों का वध करते हैं एवं विकृत वाणी वालों की वाणी को मधुरता प्रदान करते हैं. पिता जिस प्रकार बल की वृद्धि करता है, इंद्र उसी प्रकार अपने भक्तों का बल बढ़ाते हैं. ऐसे पराक्रमी इंद्र की हम स्तुति करते हैं. (६)
Indra kills the rapists and gives sweetness to the speech of those who speak distorted speeches. Just as the father increases the force, Indra increases the strength of his devotees in the same way. We praise such a mighty Indra. (6)