हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 20.77.3

कांड 20 → सूक्त 77 → मंत्र 3 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 77
क॒विर्न नि॒ण्यं वि॒दथा॑नि॒ साध॒न्वृषा॒ यत्सेकं॑ विपिपा॒नो अर्चा॑त् । दि॒व इ॒त्था जी॑जनत्स॒प्त का॒रूनह्ना॑ चिच्चक्रुर्व॒युना॑ गृ॒णन्तः॑ ॥ (३)
इंद्र फलों के वर्षक अर्थात्‌ सब को यज्ञ का फल देने वाले हैं. ये वर्षा के जल के द्वारा पृथ्वी को शस्यों अर्थात्‌ फसलों से संपन्न बनाते हुए आगमन करें. ऋत्विज्‌ यज्ञ कार्य कर रहा है. सात स्तोता शोभन स्तोत्रों द्वारा इंद्र की स्तुति कर रहे हैं. (३)
Indra is the year of fruits, that is, giving the fruits of yajna to everyone. They should come by making the earth rich with crops through rainwater. Ritwij Yajna is working. The seven stotas are praising Indra through shobhan stotras. (3)