हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 81
यद्द्याव॑ इन्द्र ते श॒तं श॒तं भूमी॑रु॒त स्युः । न त्वा॑ वज्रिन्त्स॒हस्रं॒ सूर्या॒ अनु॒ न जा॒तम॑ष्ट॒ रोद॑सी ॥ (१)
हे इंद्र! हे प्रभु! सैकड़ों आकाश और पृथ्वी भी यदि तुम्हारी समानता करना चाहें, तब भी तुम्हारे समान महान नहीं हो सकते. (१)
O Indra! Swami! Even if hundreds of heavens and earths want to equate you, they cannot be as great as you. (1)

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 81
आ प॑प्राथ महि॒ना वृष्ण्या॑ वृष॒न्विश्वा॑ शविष्ठ॒ शव॑सा । अ॒स्माँ अव॑ मघव॒न्गोम॑ति व्र॒जे वज्रिं॑ चि॒त्राभि॑रू॒तिभिः॑ ॥ (२)
हे वज्रधारी इंद्र! हमारे गोचर स्थान में अपने रक्षा साधनों के द्वारा हमारी रक्षा करो तथा अपनी महिमा से हमारी वृद्धि करो. (२)
O Vajradhari Indra! Protect us through your protective means in our transit place and increase us with your glory. (2)