हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 20.82.2

कांड 20 → सूक्त 82 → मंत्र 2 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 82
शिक्षे॑य॒मिन्म॑हय॒ते दि॒वेदि॑वे रा॒य आ कु॑हचि॒द्विदे॑ । न॒हि त्वद॒न्यन्म॑घवन्न॒ आप्यं॒ वस्यो॒ अस्ति॑ पि॒ता च॒न ॥ (२)
हे इंद्र! मैं जहां से चाहूं, वहीं से धन प्राप्त कर सकूं. जो मुझ से उत्कृष्ट होना चाहे, उसे मैं स्वर्ण का दंड दूं, हे इंद्र! मुझे इस प्रकार की शक्ति देने वाला तुम्हारे अतिरिक्त दूसरा कौन रक्षक हो सकता है? (२)
O Indra! I can get money from wherever I want. Whoever wants to be superior to me, I should punish him with gold, O Indra! Who else can be the protector other than you who gives me this kind of power? (2)