हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 89
अस्ते॑व॒ सु प्र॑त॒रं लाय॒मस्य॒न्भूष॑न्निव॒ प्र भ॑रा॒ स्तोम॑मस्मै । वा॒चा वि॑प्रास्तरत॒ वाच॑म॒र्यो नि रा॑मय जरितः॒ सोम॒ इन्द्र॑म् ॥ (१)
हे ब्राह्मणो! तुम इंद्र के लिए स्तोमों का गान करो. तुम मंत्र रूप वाणी के पार जाओ. हे स्तुति करने वालो! तुम इंद्र को सोमरस से युक्त बनाओ. (१)
O Brahmins! You sing the stoms for Indra. You go beyond the spell form speech. O praisers! You make Indra full of someras. (1)

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 89
दोहे॑न॒ गामुप॑ शिक्षा॒ सखा॑यं॒ प्र बो॑धय जरितर्जा॒रमिन्द्र॑म् । कोशं॒ न पू॒र्णं वसु॑ना॒ न्यृ॑ष्ट॒मा च्या॑वय मघ॒देया॑य॒ शूर॑म् ॥ (२)
हे स्तोताओ! वाणी तुम्हारी मित्र है. उस का दोहन करो तथा जो इंद्र शत्रुओं को क्षीण करते हैं, उन्हें बुलाओ. जो सोमरस धन से युक्त कोष के समान शुद्ध है, उसे इंद्र के लिए तैयार करो. (२)
O stotao! Speech is your friend. Exploit him and call those who weaken indra enemies. Prepare the somerasa which is as pure as the treasure containing wealth for Indra. (2)

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 89
किम॒ङ्ग त्वा॑ मघवन्भो॒जमा॑हुः शिशी॒हि मा॑ शिश॒यं त्वा॑ शृणोमि । अप्न॑स्वती॒ मम॒ धीर॑स्तु शक्र वसु॒विदं॒ भग॑मि॒न्द्रा भ॑रा नः ॥ (३)
हे इंद्र! तुम भोक्ता हो. तुम शत्रुओं को क्षीण कर देते हो. तुम मुझे क्षीण मत करना. तुम मुझे धन प्राप्त करने वाला सौभाग्य दो. मेरी बुद्धि कर्मों की ओर अग्रसर हो. (३)
O Indra! You are a consumer. You weaken your enemies. Don't you undermine me. You give me the privilege of getting money. May my intellect move towards deeds. (3)

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 89
त्वां जना॑ ममस॒त्येष्वि॑न्द्र सन्तस्था॒ना वि ह्व॑यन्ते समी॒के । अत्रा॒ युजं॑ कृणुते॒ यो ह॒विष्मा॑न्नासुन्वता स॒ख्यं व॑ष्टि॒ शूरः॑ ॥ (४)
हे इंद्र! मेरे पुरुष तुम्हीं को बुलाते हैं. जो वीर तुम्हारी मित्रता की कामना करते हैं तथा हवि वाला अनुष्ठान करते हैं, वे सोमरस का संस्कार भी करते हैं. (४)
O Indra! My men call you. The heroes who wish for your friendship and perform the ritual of havi also perform the rites of Someras. (4)

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 89
धनं॒ न स्प॒न्द्रं ब॑हु॒लं यो अ॑स्मै ती॒व्रान्त्सोमाँ॑ आसु॒नोति॒ प्रय॑स्वान् । तस्मै॒ शत्रू॑न्त्सु॒तुका॑न्प्रा॒तरह्नो॒ नि स्वष्ट्रा॑न्यु॒वति॒ हन्ति॑ वृ॒त्रम् ॥ (५)
हवि धारण करने वाला जो पुरुष इंद्र के निमित्त सोमरस का संस्कार नहीं करता, उस का धन सरकता जाता है. इंद्र उसे अपने शत्रुओं में सम्मिलित कर के उस पर वज्र का प्रहार करते हैं. (५)
The man who wears havi, who does not perform the rites of Someras for Indra, his wealth moves. Indra includes him in his enemies and strikes him with a thunderbolt. (5)

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 89
यस्मि॑न्व॒यं द॑धि॒मा शंस॒मिन्द्रे॒ यः शि॒श्राय॑ म॒घवा॒ काम॑म॒स्मे । आ॒राच्चि॒त्सन्भ॑यतामस्य॒ शत्रु॒र्न्यस्मै द्यु॒म्ना जन्या॑ नमन्ताम् ॥ (६)
जो इंद्र हमारी इच्छाओं को पूर्ण करने वाले हैं, जिन इंद्र की हम प्रशंसा करते हैं, उन इंद्र के समीप आते ही शत्रु भयभीत हो जाते हैं. संसार के सभी प्राणी इंद्र को नमस्कार करते हैं. (६)
The Indra who is going to fulfill our desires, the Indra whom we admire, the enemies become frightened as soon as they come close to Indra. All the creatures of the world salute Indra. (6)

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 89
आ॒राच्छत्रु॒मप॑ बाधस्व दू॒रमु॒ग्रो यः शम्बः॑ पुरुहूत॒ तेन॑ । अ॒स्मे धे॑हि॒ यव॑म॒द्गोम॑दिन्द्र कृ॒धी धियं॑ जरि॒त्रे वाज॑रत्नाम् ॥ (७)
हे इंद्र! तुम अपने उग्र वज्र से पास के अथवा दूर के शत्रु को व्यथित करो. तुम हम को अन्न वाली बुद्धि प्रदान करते हुए अन्न तथा पशुओं से पूर्ण धन में प्रतिष्ठित करो. (७)
O Indra! You should disturb the near or distant enemy with your fierce thunderbolt. You give us food-rich intelligence and establish us with food and animals in complete wealth. (7)

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 89
प्र यम॒न्तर्वृ॑षस॒वासो॒ अग्म॑न्ती॒व्राः सोमा॑ बहु॒लान्ता॑स॒ इन्द्र॑म् । नाह॑ दा॒मानं॑ म॒घवा॒ नि यं॑स॒न्नि सु॑न्व॒ते व॑हति॒ भूरि॑ वा॒मम् ॥ (८)
जिन इंद्र के समीप तीव्र स्वाद वाला सोमरस गमन करता है, वे इंद्र धन की बाधक रस्सी को रोकते हैं तथा सोम का संस्कार करने वाले स्तोता को असीमित धन प्रदान करते हैं. (८)
Indra, near whom the intensely flavoured Someras travels, stops the obstacle rope of Indra wealth and gives unlimited wealth to the stota who performs the rites of Soma. (8)
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