हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 20.89.5

कांड 20 → सूक्त 89 → मंत्र 5 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 89
धनं॒ न स्प॒न्द्रं ब॑हु॒लं यो अ॑स्मै ती॒व्रान्त्सोमाँ॑ आसु॒नोति॒ प्रय॑स्वान् । तस्मै॒ शत्रू॑न्त्सु॒तुका॑न्प्रा॒तरह्नो॒ नि स्वष्ट्रा॑न्यु॒वति॒ हन्ति॑ वृ॒त्रम् ॥ (५)
हवि धारण करने वाला जो पुरुष इंद्र के निमित्त सोमरस का संस्कार नहीं करता, उस का धन सरकता जाता है. इंद्र उसे अपने शत्रुओं में सम्मिलित कर के उस पर वज्र का प्रहार करते हैं. (५)
The man who wears havi, who does not perform the rites of Someras for Indra, his wealth moves. Indra includes him in his enemies and strikes him with a thunderbolt. (5)