हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 20.9.2

कांड 20 → सूक्त 9 → मंत्र 2 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 9
द्यु॒क्षं सु॒दानुं॒ तवि॑षीभि॒रावृ॑तं गि॒रिं न पु॑रु॒भोज॑सम् । क्षु॒मन्तं॒ वाजं॑ श॒तिनं॑ सह॒स्रिणं॑ म॒क्षू गोम॑न्तमीमहे ॥ (२)
जिस प्रकार दुर्भिक्ष पड़ने पर लोग कंद, मूल, फल आदि से संपन्न पर्वत की प्रार्थना करते हैं, उसी प्रकार हम सुंदर दान वाले, प्रजाओं के पोषक, दीप्ति युक्त, स्तुति करने योग्य एवं गाय आदि से संपन्न धन की प्रार्थना करते हैं. (२)
Just as people pray for a mountain full of tubers, roots, fruits, etc. when there is a famine, in the same way we pray for the wealth of beautiful gifts, nourishing, radiant, praiseworthy and rich in cows etc. (2)