हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 20.91.5

कांड 20 → सूक्त 91 → मंत्र 5 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 91
वि॒भिद्या॒ पुरं॑ श॒यथे॒मपा॑चीं॒ निस्त्रीणि॑ सा॒कमु॑द॒धेर॑कृन्तत् । बृह॒स्पति॑रु॒षसं॒ सूर्यं॒ गाम॒र्कं वि॑वेद स्त॒नय॑न्निव॒ द्यौः ॥ (५)
बृहस्पति पुर का विनाश कर के पश्चिम दिशा में सोते हैं. वे सागर के भागों का त्याग नहीं करते तथा आकाश में कड़कते हुए उषा, सूर्य तथा सत्य गौ को प्राप्त करते हैं. (५)
Jupiter destroys the east and sleeps in the west direction. They do not renounce parts of the ocean and get usha, sun and satya gau while breaking in the sky. (5)