हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद (कांड 3)

अथर्ववेद: | सूक्त: 1
अ॒ग्निर्नः॒ शत्रू॒न्प्रत्ये॑तु वि॒द्वान्प्र॑ति॒दह॑न्न॒भिश॑स्ति॒मरा॑तिम् । स सेनां॑ मोहयतु॒ परे॑षां॒ निर्ह॑स्तांश्च कृणवज्जा॒तवे॑दाः ॥ (१)
हिंसक शत्रुओं की सेना को मोहित कर के जातवेद अर्थात्‌ अग्नि शस्त्रास्त्र उठाने में असमर्थ बना दे. देवासुर संग्राम में देव सेना का प्रतिनिधित्व करने वाले अग्नि देव शत्रुओं के अंगों को भस्म करते हुए आगे बढ़ें. (१)
Fascinate the army of violent enemies and make it unable to lift the Jatveda i.e. agni weapon. Agni Dev, who represents the Devas army in the Devasur war, proceed, devouring the organs of the enemies. (1)

अथर्ववेद (कांड 3)

अथर्ववेद: | सूक्त: 1
यू॒यमु॒ग्रा म॑रुत ई॒दृशे॑ स्था॒भि प्रेत॑ मृ॒णत॒ सह॑ध्वम् । अमी॑मृण॒न्वस॑वो नाथि॒ता इ॒मे अ॒ग्निर्ह्ये॑षां दू॒तः प्र॒त्येतु॑ वि॒द्वान् ॥ (२)
हे मरुतो! तुम संग्राम में सहायता करने के लिए मेरे समीप रहो एवं मेरे शत्रुओं पर प्रहार करने जाओ. वसु देवगण भी मेरी प्रार्थना पर शत्रुनाश के लिए आगे बढ़ें. वसुओं में प्रधान अग्नि भी शत्रुओं को जानते हुए दूत के समान अग्रसर हो. (२)
O Maruto! You stay close to me to help in the struggle and go to attack my enemies. Vasu Devgan should also proceed to destroy the enemy on my prayer. Among the Vasus, the chief agni should also move forward like an angel knowing the enemies. (2)

अथर्ववेद (कांड 3)

अथर्ववेद: | सूक्त: 1
अ॑मित्रसे॒नां म॑घवन्न॒स्मान्छ॑त्रूय॒तीम॒भि । यु॒वं तानि॑न्द्र वृत्रहन्न॒ग्निश्च॑ दहतं॒ प्रति॑ ॥ (३)
हे इंद्र! निरापराधों के प्रति शत्रु के समान आचरण करने वाली सेना के सामने जाओ. हे वृत्रनाशक इंद्र! तुम और अग्नि दोनों प्रतिकूल बन कर शत्रु सेना को भस्म करो. (३)
O Indra! Go before the army that behaves like an enemy towards the innocent. O Indra, the destroyer of trees! Both you and agni become adversarial and consume the enemy army. (3)

अथर्ववेद (कांड 3)

अथर्ववेद: | सूक्त: 1
प्रसू॑त इन्द्र प्र॒वता॒ हरि॑भ्यां॒ प्र ते॒ वज्रः॑ प्रमृ॒णन्ने॑तु॒ शत्रू॑न् । ज॒हि प्र॒तीचो॑ अ॒नूचः॒ परा॑चो॒ विष्व॑क्स॒त्यं कृ॑णुहि चि॒त्तमे॑षाम् ॥ (४)
हे इंद्र! हरि नाम के अश्चों से युक्त रथ में बैठ कर तुम समतल मार्ग से अपने वज्र को धारण करते हुए शत्रु सेना की ओर गमन करो. तुम सामने और पीछे से आते हुए तथा युद्ध से मुंह मोड़ कर भागते हुए शत्रुओं का विनाश करो. हमारे विनाश के प्रति दृढ़ निश्चय वाले इन के चित्त को तुम सर्वथा अव्यवस्थित कर दो. (४)
O Indra! Sitting in a chariot with tears named Hari, you should go towards the enemy army, wearing your thunderbolt through the flat path. Destroy the enemies by coming from the front and behind and running away from the war. Make their minds, who are determined to destroy us, completely disorder. (4)

अथर्ववेद (कांड 3)

अथर्ववेद: | सूक्त: 1
इन्द्र॒ सेनां॑ मोहया॒मित्रा॑णाम् । अ॒ग्नेर्वात॑स्य॒ ध्राज्या॒ तान्विषू॑चो॒ वि ना॑शय ॥ (५)
हे इंद्र! हमारे शत्रुओं की सेना को कर्तव्य ज्ञान से शून्य बना दो. अग्नि और वायु के सहयोग से भस्म करने हेतु विकराल बनी हुई अपनी गति से शत्रु सेना को युद्ध से मुंह मोड़ कर भागने पर विवश कर के नष्ट कर दो. (५)
O Indra! Make the army of our enemies void of duty knowledge. With the help of agni and air, destroy the enemy army by forcing them to flee from the war at their own speed. (5)

अथर्ववेद (कांड 3)

अथर्ववेद: | सूक्त: 1
इन्द्रः॒ सेनां॑ मोहयतु म॒रुतो॑ घ्न॒न्त्वोज॑सा । चक्षूं॑ष्य॒ग्निरा द॑त्तां॒ पुन॑रेतु॒ परा॑जिता ॥ (६)
देवों के अधिपति इंद्र शत्रु सेना को किंकर्तव्यविमूढ़ कर दें और मरुत्‌ अपने तेज से उस का विनाश करें. अग्नि देव उन की आंखों से देखने की शक्ति छीन लें. इस प्रकार पराजित शत्रु सेना वापस चली जाए. (६)
Indra, the ruler of the gods, should make the enemy army abyss and kill it with his glory. May Agni Dev take away the power to see from their eyes. Thus the defeated enemy army should go back. (6)

अथर्ववेद (कांड 3)

अथर्ववेद: | सूक्त: 2
अ॒ग्निर्नो॑ दू॒तः प्र॒त्येतु॑ वि॒द्वान्प्र॑ति॒दह॑न्न॒भिश॑स्ति॒मरा॑तिम् । स चि॒त्तानि॑ मोहयतु॒ परे॑षां॒ निर्ह॑स्तांश्च कृणवज्जा॒तवे॑दाः ॥ (१)
सब कुछ जानने वाले और देवदूत अग्नि हमारे शत्रुओं को जला डालें और सामने की ओर से आते हुए हिंसक शत्रुओं के मन को किंकर्तव्यविमूऴ कर दें. जातवेद अग्नि उन्हें इस योग्य न रखें कि वे हाथ से शस्त्र उठा सकें. (१)
May the agni of the angels, who know everything, burn our enemies and make the minds of violent enemies coming from the front. Jatveda Agni should not keep them worthy that they can take up arms by hand. (1)

अथर्ववेद (कांड 3)

अथर्ववेद: | सूक्त: 2
अ॒यम॒ग्निर॑मूमुह॒द्यानि॑ चि॒त्तानि॑ वो हृ॒दि । वि वो॑ धम॒त्वोक॑सः॒ प्र वो॑ धमतु स॒र्वतः॑ ॥ (२)
हे शन्रुओ! तुम्हारे हृदयों में जो हम पर आक्रमण करने संबंधी विचार हैं, उन्हें समाप्त करते हुए अग्नि देव तुम्हारे हृदयों को मोहित करें. वे तुम्हें तुम्हारे निवास से पूरी तरह निकाल दें एवं तुम्हारे स्थानों को नष्ट कर दें. (२)
O shanruo! May the Agni God fascinate your hearts by ending the thoughts that are in your hearts about attacking us. They will completely drive you out of your dwelling and destroy your places. (2)
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