अथर्ववेद (कांड 3)
इ॒हैव ध्रु॒वा प्रति॑ तिष्ठ शा॒ले ऽश्वा॑वती॒ गोम॑ती सू॒नृता॑वती । ऊर्ज॑स्वती घृ॒तव॑ती॒ पय॑स्व॒त्युच्छ्र॑यस्व मह॒ते सौभ॑गाय ॥ (२)
हे शाला! तू बहुत से घोड़ों, गायों, प्रिय बालकों की मधुर वाणी, पर्याप्त अन्न, घृत एवं दूध से पूर्ण हो कर इसी प्रदेश में स्थिर हो और हमारे महान कल्याण के लिए प्रयत्नशील बन. (२)
O school! Be full of the sweet speech of many horses, cows, dear children, enough food, ghee and milk and be stable in this region and strive for our great welfare. (2)