हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 3.15.2

कांड 3 → सूक्त 15 → मंत्र 2 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 3)

अथर्ववेद: | सूक्त: 15
ये पन्था॑नो ब॒हवो॑ देव॒याना॑ अन्त॒रा द्यावा॑पृथि॒वी सं॒चर॑न्ति । ते मा॑ जुषन्तां॒ पय॑सा घृ॒तेन॒ यथा॑ क्री॒त्वा धन॑मा॒हरा॑णि ॥ (२)
व्यापार के जो बहुत से मार्ग हैं और धरती तथा आकाश के मध्य में लोग जिन मार्गो पर गमन करते हैं, वे मार्ग घी, दूध से हमारी सेवा करें, जिस से हम व्यापार कर के लाभ सहित मूल धन ले कर अपने घर आ सकें. (२)
The many ways of trade and the paths that people travel between the earth and the sky, serve us with ghee, milk, so that we can come home with the basic money including the benefit of doing business. (2)