हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 3.15.4

कांड 3 → सूक्त 15 → मंत्र 4 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 3)

अथर्ववेद: | सूक्त: 15
इ॒माम॑ग्ने श॒रणिं॑ मीमृषो नो॒ यमध्वा॑न॒मगा॑म दू॒रम् । शु॒नं नो॑ अस्तु प्रप॒णो वि॒क्रय॑श्च प्रतिप॒णः फ॒लिनं॑ मा कृणोतु । इ॒दं ह॒व्यं सं॑विदा॒नौ जु॑षेथां शु॒नं नो॑ अस्तु चरि॒तमुत्थि॑तं च ॥ (४)
हे अग्नि! हम से दूर तक चलने से जो हिंसा हुई है और हमारे व्रत का लोप हुआ है, उसे क्षमा करो. व्यापार की वस्तुओं का क्रय और विक्रय दोनों ही मुझे लाभकारी हों. हे इंद्र और अग्नि! तुम एकमत हो कर इस हव्य को स्वीकार करो. तुम दोनों की कृपा से मेरा क्रयविक्रय और उस से लाभ के रूप में प्राप्त धन मेरे लिए सुखकारी हो. (४)
O agni! Forgive the violence that has happened by walking away from us and our fast has disappeared. Both buying and selling of business items should be beneficial to me. O Indra and Agni! You agree and accept this desire. By the grace of both of you, my purchase and the money received from it in the form of profit is pleasant for me. (4)