हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 3.19.1

कांड 3 → सूक्त 19 → मंत्र 1 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 3)

अथर्ववेद: | सूक्त: 19
संशि॑तं म इ॒दं ब्रह्म॒ संशि॑तं वी॒र्यं बल॑म् । संशि॑तं क्ष॒त्रम॒जर॑मस्तु जि॒ष्णुर्येषा॑मस्मि पु॒रोहि॑तः ॥ (१)
मेरा ब्राह्मणत्व जाति से पतित करने वाले दोष का विनाश करने में प्रबल हो. मंत्र के प्रभाव से उत्पन्न मेरी शक्ति और मेरा शारीरिक बल अमोघ अर्थात्‌ कभी असफल न होने वाला बने. मैं जिस का पुरोहित हूं, वह क्षत्रिय जाति जय प्राप्त करने वाली तथा वृद्धावस्था से रहित बने. (१)
May my Brahmanism prevail in destroying the defects that degenerate from the jati. My strength and my physical strength generated by the influence of the mantra should be unfathomable. The Kshatriya jati, to whom I am a priest, should be victorious and devoid of old age. (1)