अथर्ववेद (कांड 3)
आ ते॒ योनिं॒ गर्भ॑ एतु॒ पुमा॒न्बाण॑ इवेषु॒धिम् । आ वी॒रोऽत्र॑ जायतां पु॒त्रस्ते॒ दश॑मास्यः ॥ (२)
हे स्त्री! बाण जिस प्रकार स्वाभाविक रूप से तरकश में पहुंच जाता है, उसी प्रकार पुरुष के वीर्य से युक्त गर्भ तेरे जननांग में पहुंचे. वह गर्भ दस मास के पश्चात पुत्र के रूप में परिवर्तित हो कर तथा सशक्त बन कर जन्म ले. (२)
Oh woman! Just as the arrow naturally reaches the penis, so the womb containing a man\'s semen reaches your genitalia. After ten months of pregnancy, he will be transformed into a son and born strong. (2)