अथर्ववेद (कांड 3)
शु॒चा वि॒द्धा व्यो॑षया॒ शुष्का॑स्या॒भि स॑र्प मा । मृ॒दुर्निम॑न्युः॒ केव॑ली प्रियवा॒दिन्यनु॑व्रता ॥ (४)
दाह करने वाले तथा शोकात्मक बाण से घायल होने के कारण तेरा कंठ सूख जाए और उस कंठ के कारण अपना अभिप्राय प्रकट करने में असमर्थ हो कर तू मेरे समीप आ. तू मृदुभाषिणी, एकमात्र मुझ से रक्षा पाने वाली तथा मेरे अनुकूल बोलने वाली बन और मेरे अनुकूल आचरण कर. (४)
Your throat may dry up because of the burning and the wounding arrow, and because of that throat, unable to express your intention, come close to me. You become soft-spoken, the only protector from me and speak in favor of me and behave in favor of me. (4)