हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 3.25.6

कांड 3 → सूक्त 25 → मंत्र 6 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 3)

अथर्ववेद: | सूक्त: 25
व्य॑स्यै मित्रावरुणौ हृ॒दश्चि॒त्तान्य॑स्यतम् । अथै॑नामक्र॒तुं कृ॒त्वा ममै॒व कृ॑णुतं॒ वशे॑ ॥ (६)
हे मित्र और वरुण! इस स्त्री के हुदय को ज्ञानशून्य कर दो. इस के पश्चात इसे कर्तव्य और अकर्तव्य के ज्ञान से शून्य कर के मेरे वशीभूत बना दो. (६)
Hey friend and Varun! Make this woman's heartless. After this, make it void of the knowledge of duty and non-duty and make it subjugated to me. (6)